May 24, 2018

मार्लिन मुनरो प्रेग्नेंट है -------mangopeople

 गोवा में एक फोर्ट में गई और उसके बुर्ज पर बैठ एक अच्छी फोटो खिचवाई और  बिलकुल उसी जगह खड़े हो कर अफसोस किया की कोई वन पीस मिडी या स्कर्ट  क्यों ना पहना आज, वरना आज एक और इच्छा गोवा में पूरी हो जानी थी  | खैर छोटा भाई और उसकी पत्नी यहाँ खड़े हो गए और टायटेनिक वाली पोज़ में , छोटे भाई की पत्नी को बोला जल्दी ठीक से पोज़ बनाओ फोटो लेलु वरना अभी तुम्हारे टायटेनिक का मार्लिन मुनरो हो जाना है , उसने घटनो तक का  वन पीस ड्रेस पहन रखा था | उसके कौन मार्लिन मुनरो के सवाल का जवाब दिया फोटो लेने दो जवाब मिल जाएगा | जल्दी करने के बाद भी बस दो क्लिक ही कर पाई थी और एक जोरदार हवा निचे समंदर से आई और उसके दोनों तरफ फैले हाथ तुरंत स्कर्ट पर आ गये , हम सब हस पड़े , ये है मार्लिन मुनरो समझी | फिर तुरंत उन्हें मार्लिन मुनरो की प्रसिद्द पोज़ वाली फोटो दिखा ज्ञान बढ़ाया गया | टायटेनिक पोज़ वाली फोटो भाई ने फेसबुक पर लगाई सभी ने अपनी श्रद्धानुसार उस पर टिप्पणी दी , लेकिन सबसे धांसू कमेंट सीधे मम्मी को फोन पर मिला शाम को कोलकता वाली मौसी से |  बधाई हो तुम फिर से दादी बनने वाली हो , हमें बताया भी नहीं | मम्मी बोली लो मै फिर से दादी बनने वाली हूँ मुझे ही नहीं पता और तुमको पता चल गया उतनी दूर | फेसबुक पर बहु की फोटो देखी प्रेग्नेंट लग रही थी |
              किस्सा ये था कि मौसी को एक बेटा और बेटी है , दीदी ने जुड़वा बच्चे एक लड़का , लड़की कर एक बार में काम निपटा दिया | लेकिन सुपुत्र को एक बेटी थी और थाइराइड के कारण बहु दुबारा कंसीव नहीं कर पा रही थी , प्रयास करते करते बेटी १० साल की हो गई फिर दवा दारू के बाद बहु ने दूसरे का नंबर लगा दिया | अब इतने समय बाद दूसरा बच्चा और वही सामाजिक ताना बेटे के लिए किया होगा इतने सालो बाद का शायद दबाव , जो भी रहा हो मौसी इस ताक में थी कि कोई और भी दूसरे न नंबर लगा दे तो उनका दबाव कम हो , मुझ तक से पूछ डाला दूसरे के बारे में नहीं सोच रही ,उनकी पोती मेरी बेटी से आठ महीने ही छोटी है और भाई मुझसे एक साल ही छोटा है , मै हँस पड़ी क्या मौसी इस उमर में , दिमाग नहीं ख़राब मेरा | उस समय अंदाजा नहीं था कि वो क्यों पूछ रही है | अब जैसे सावन के अंधे को बस हरियाली नजर आती है उसी तरह उस फोटो में भाई की पत्नी की ड्रेस में थोड़ी सी हवा भर गई थी ठीक मार्लिन मुनरो पोज़ के पहले और उसी से उन्होंने अंदाजा लगा कर बधाई तक दे दी | अच्छी खासी हमारी रोज़ मार्लिन मुनरो को प्रेग्नेंट बना दिया | 
आप कुछ भी पोस्ट लिखिये , कई बार पाठको के मन में अपना ही कुछ चल रहा होता है और वो अपनी श्रद्धानुसार उस पर टिप्पणी दे देते है और पोस्ट और आप कि सोच  का  अंदाजा भी लगा लेते है |












May 23, 2018

मेरी सोनी मेरी तम्मना झूठ नहीं है मेरा प्यार -------mangopeople



ये कलीना यूनिवर्सिटी कैसे जाते है
तुम्हे वहां क्या काम है
मुंबई आये छः महीने से ऊपर हो गए , अभी तक कही भी अकेले जा नहीं सकती , निकलू भी तो कहा।  इस  तरह कोई मुझे तो जॉब देने से रहा मुझे शहर के बारे में कुछ पता ही नहीं है | इसलिए सोचा कॉलेज ज्वॉइन  कर लेती हूँ , रोज बाहर निकलना हो जायेगा , शहर जान जाउंगी तो खुद से ही जॉब देख लुंगी |
अच्छा तो तुम्हे जॉब करना है
क्यों तुम्हे कोई परेशानी है
नहीं नहीं , कोई परेशानी नहीं है
फिर ऐसे क्यों पूछ रहे हो
नहीं , अभी तक हमारे घर में किसी औरत ने बाहर काम नहीं किया है तो ---
तो क्या
मतलब जॉब क्यों करना चाहती हो
अच्छा अच्छा ये बात है | अब  ये  बताओ  कि मुझे अपने मन की बात बतानी है या तुम्हे कन्विंस करना है
क्या ये दोनों अलग चीजे है
बिलकुल
ओके मान लो , ऐसा  इमैजिन करो सोचो की मै कह रहा हूँ मुझे कन्विंस करो तो
तो सुनो ,  ये जो पत्नियों का प्यार होता है ना अपने पतियों के लिए ये सच्चा नहीं होता इसमें मिलावट होती है अपने स्वार्थ की , क्योकि फाइनेंशली अपने पति पर निर्भर होती है ना | अकेले आदमी से शादी करती ही कहा है , पूरा पॅकेज होता है घर है की नहीं,  जॉब कैसी है , कितना कमाता है , आगे भविष्य कैसा होगा उसके साथ |  सब कुछ ठोक बजाने के बाद पति बनाती है |  बहुत सारी  पत्नियां तो  पति को बस  एटीएम मशीन समझती है | कुछ मजबूरी में प्यार करती है कि उनकी सारी जरूरतों की पूर्ति तो पति करता है अब इसे प्यार न करे तो अपनी जरुरत कैसे पूरी होगी | पति अस्पताल चला जाए या  मर मरा  भी जाये तो उसके जाने का गम कम  गम  और चिंता इस बात की ज्यादा होती है कि अब मेरा क्या होगा पैसे कहा से आयेंगे , घर कैसे चलेगा , बच्चो का क्या होगा | उस   बेचारे  के लिए सच्चा रोने वाला भी कोई नहीं होता |   पत्नी तो छोडो रिश्तेदार भी यही उम्मीद करते है , सब तुमको बस एटीएम मशीन समझते है स्वार्थभरा झूठा प्यार करते है | लेकिन मै ऐसा नहीं करना चाहती।  मै तुम्हारे पैसे से नहीं सिर्फ तुम्हे प्यार करना चाहती हूँ , मै तुमको सच्चा , ट्रू , निस्वार्थ प्यार करना चाहती हूँ , समझे  |
हम्म्म

क्या हुआ कुछ बोलोगे ठीक से कन्वेंस नहीं हुए क्या
कलीना कब चलना है
गुर्ररर
अरे चल तो रहा हु अब क्यों गुस्सा हो
मुझे लेगा था मेरे मन की सुनोगे , पूछोगे मै क्या चाहती हूँ , लेकिन नहीं एक नंबर के  स्वार्थी हो बस अपनी पड़ी है  | बस खुद कन्विंस होना है मै क्या चाहती हूँ किसी को पड़ी ही नहीं है |
नहीं मै बस वही पूछने वाला था
 मिस्टर निश्चल आज की तारीख लिख लो आज से हर बात केवल तुम्हे कन्वेंस करने वाले ही तरीके से बताई जायेगी  और देखना ये तुमको कितना भारी पड़ने वाला | गुर्ररर

#अधूरीसीकहानी_अधूरेसेकिस्से

May 12, 2018

पंजाबी लडके को मद्रासी लड़की से प्यार हुआ और शादी हो गई ------mangopeople



शादी के कुछ ही महीने हुए थे  एक शाम निश्चल मै सब्जी लेने के लिए निकले , उसके पहले उन्हें बनारस की ढ़ेर सारी बाते बता रही थी, बताते बताते पुरे बनारसी मूड में आ गई थी | बाहर निकल दरवाजे में ताला लगाया और हाथ आगे बढ़ा कर बोला ताली दो , उन्होंने झट मेरे हाथ पर अपने हाथ से ताली दे दी | मै  हँसी और फिर हाथ आगे बढ़ा कर बोला ओके वैरी फनी अब ताली दो उन्होंने फिर हाथ आगे बढ़ाया और मेरी हाथ पर अपने हाथ से ताली दे दी | चलो अब मजाक मत करो चाभियाँ दो देर हो रही है | अरे तुमने चाभियाँ कब मांगी |  मांगी तो दो बार और तुमको मजाक सूझ रहा है | तुमने तो ताली मांगी थी मैंने दी |  फिर याद आया कि ना मै बनारस में हूँ और ना ये बनारसी |  अरे यार हमारे बनारस में चाभियों को ही ताली कहते है,  ताला और ताली कितना सिंम्पल है | मैंने कभी सूना ही नहीं तो मुझे क्या समझ आयेगा | उलटा मुझे लग रहा था ये बार बार ताली क्यों मांग रही हो मुझसे | सुनो एक बात बताओ ये कई महीने से मै तुमसे बात कर रही  हूँ तुमको कुछ समझ में आती है कि  मै क्या बोल रही हु , या बस सुन लेते हो | थोड़ा रुके और सोच कर बोले कभी कभी कुछ कुछ बात समझ नहीं आती | तुम्हे मेरी बात समझ नहीं आती और तुम मुझे आज बता रहे हो इतने महीनो बाद | हद है आज मै नहीं पूछती तो मै सारी  जिंदगी बड़बड़ करती और तुमको समझ कुछ नहीं आता |  ये कह हँसते हुए एक गाना गा दिया पंजाबी लडके को मद्रासी लड़की से प्यार हुआ और शादी हो गई | अब ये क्या है | लो अब तुमने ये गाना भी नहीं सुना है | मतलब ऐसे कपल के बीच लैंग्वेज प्रॉबलम हो गई दोनों के एक दूजे की बात समझ ही ना आती |
             दुनियां में लोग ऐसे लोग चाहते है जो उन्हें समझे उनकी बातो को सुने समझे ताकि वो अपना दिल खोल कर उसके सामने रख दे | लेकिन वो भूल जाते है कि  जैसे जैसे हम अपना दिल खोलते है सुनने वाला की अपनी सोच , पूर्वाग्रहों की मिलावट उसमे होती जाती है और हमारी एक छवि उसके मन में बन जाती है | लोग कहने वालो को अपने हिसाब से जज करने लगते है और वो हमारे लिए पूर्वाग्रह पाल कर बैठ जाते है | समझने वाला अपनी समझ से समझने लगता है वो नहीं समझता जो हम कहना चाहते है | मेरे हिसाब से तो अपना दिल खोल कर रखने के लिए सबसे अच्छा वो इंसान है जो असल में आप की बात समझता ही नहीं और  जब समझता है तो बस उतना ही जितना आप उसे समझाते है | जीवन में पहली बार कोई ऐसा मिल गया , जिसे सब कुछ कहा जा सकता है दिल में जितना भी जहर,प्यार, गुस्सा, नाराजगी , ईर्ष्या , जलन सब बक दो जिसे बात ही ठीक से समझ न आ रही हो वो बस सुनेगा लेकिन मुझे जज नहीं करेगा |  इंसानी भावो के आने जाने से होने वाली स्वाभाविक परिवर्तनों से वो हमारे लिए कोई पूर्वाग्रह नहीं बनाएगा , हमारे लिए जजमेंटल नहीं होगा  | जब किसी मित्र की सफलता पर खुश होते कहती कि निश्चल जलन हो रही है उससे,  तो कभी ये नहीं सोचा की जलनखोर मित्र हूँ , समझा तो बस इतना की ख़ुशी के आँसू की तरह एक ख़ुशी वाली जलन भी होती है | जब उसी मित्र के किसी उसके किसी कठिन समय में उसे फोन पर हिम्मत बंधाते मजाक करती और फोन रखते कहती कि  मुझे उसके लिए डर लग रहा है उसकी चिंता हो रही है तो ये न समझा की ढकोसला कर रही हूँ | इंसान समझे या न समझे बाते अवचेतन मन में जाती रहती है , एक सेफ स्टोरेज में और एक दिन जरूर बाहर आयेगी एक विश्वास  भरोसे  रूप  जब उनकी जरुरत होगी |


#अधूरीसीकहानी_अधूरेसेकिस्से




         

       


                 





                                               













May 10, 2018

सुंदरता हॉटनेस ये सब वाकई किसी स्त्री के लिए एक एटीट्यूट है और किसी पुरुष के दिमाग का फितूर ------mangopeople

 

   
सुंदरता लड़की के लिए प्राकृतिक है ये स्त्रीय अंग है लेकिन ये कोई योग्यता नहीं है जिसे बेमतलब का निखारने में समय व्यर्थ किया जाये  |  जिनमे कुछ काबलियत नहीं होती वही आगे बढ़ कर बेमतलब लीपा पोती कर अपनी सुंदरता दिखाते है | बचपन में हमारे मातृसत्तात्मक घर का बिन कहा ये सन्देश बड़ा साफ़ था काबिल बनो सहूर सीखो जीवन में वही काम आएगा  | ये सहूर सलाई कढ़ाई , खाना बनाने से  लेकर पढाई लिखाई कर कुछ बनने तक में से कुछ भी हो सकता था |   लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं था कि अच्छे दिखने के लिए कुछ करो ही मत , खूब स्टाइल में कपडे पहनो , ( हम डिजाइनर कपडे पहनते थे उस जमाने में , क्योकि कपडे घर में सिले जाते थे बुआ , दीदी या मम्मी द्वारा ) सबसे अलग दिखो जो करो अपने लिए करो लेकिन इन सब को योग्यता मत समझो और समय बर्बाद न करो | फिर  सुंदरता का कोई पैमाना उस जगह कैसे तय हो,  जहा हर तरह के लोग रहा रहे हो | कोई सांवला लेकिन नयन नक्श में अच्छा तो कोई गोरा लेकिन लेकिन शकल कोई ख़ास नहीं कोई लंबा तो कोई छोटा कोई अति दुबला तो कोई मोटा | इसलिए खामखा का सुन्दर दिखने के प्रयास में हम लोग कभी पड़े ही नहीं |  हमारे लिए कभी कोई कॉम्लीमेन्ट होता तो पहला "अच्छी" दिख रही हो और सबसे बड़ा , "बड़ी अच्छी" दिख रही हो | मतलब जीवन सुन्दर , प्यारी , ब्यूटीफुल गॉर्जियस जैसे तमाम शब्दों के बिना ही गुजर गया |  ये शब्द कभी तारीफ बने ही नहीं हम लोगो के लिए , उलटा ये एहसास दिलाते की नाकाबिल हो ,उसे मुझ में और कुछ न दिखा |
                                                                  बड़े होने पर एक फिल्म से ज्ञान मिला , फिल्म में सांवली सी आधुनिक हीरोइन बोलती है सुंदरता कुछ नहीं होती , ऐटिट्यूड  सब कुछ होता है | आप खुद को कैसे दुसरो सामने रखते है आप का ऐटिट्यूड कैसा है ये बड़ी बात है , वरना भारत में मेरे सांवले रंग के बाद भी लोग मेरी सुंदरता की इतनी तारीफ नहीं करते | फिर मुझ टेढ़े  ऐटिट्यूड वालो को पता चला  ऐटिट्यूड भी कुछ होता है , और हम सुन्दर क्यों नहीं है , ऐसे टेढ़े  ऐटिट्यूड वाले से लोग डरते है | साथ में ये भी समझ आ गया कि सुन्दर दिखने की जगह लोगो को डराना ज्यादा मजेदार है | उस खूबसूरती के पीछे क्या भागना जिसका कोई भरोसा नहीं वो कब अपना रूप बदल दे | एक सिकुड़ी सी अभिनेत्री आती है और बड़े  ऐटिट्यूड से बोलती है जीरो फिगर ही सुंदरता है और लोग उसे ही सुन्दर मान पैमाना तय कर देते है | अचानक से कर्वी बॉडी वाली भारतीय सौंदर्य मोटापा दिखने लगता है और पचके गाल तेजहीन चेहरा , गर्दन की हड्डिया और जीरो कमर सुन्दर हो जाता है | अभिनेत्री बच्चे को जन्म देती है और उसी अदा से अपनी कर्वी कमर दिखा सुन्दर बताती है और रातो रात खूबसूरती का पैमाना बदल जाता है और भारतीय कर्वी स्थूल शरीर खूबसूरत हो जाता है | अब लोगो की नजर स्त्री के कर्व पर जाने लगती है और जीरो कमर वालो को हसींन लोगो के लिस्ट से छांट दिया जाता है | ऐसी सुंदरता जो नजर के साथ बदल जाये उसे पाना एक मुश्किल क्या लगभग असंभव काम था लेकिन ये पक्की बात है कि ऐटीट्यूड ही आप को हर रूप में सुन्दर बना सकता है लोगो की नजर में | तो असल में सुंदरता किसी स्त्री के लिए बस एक  ऐटिट्यूड है और पुरुषीय दिमाग का मात्र फितूर |  सोशल मिडिया में ऐसी ढेरो महिलाओ को इस नियम का पालन करते देख सच में बड़ा मजा आता है और अच्छा लगता है कि स्त्री ने अब अपने रूप और सौंदर्य को लेकर अपना पैमाना बनाना शुरू कर दिया है |

           हवा में उड़ता जाये लाल दुपट्टा

    विवाह के बाद  हमने हॉटनेस की भी नहीं परिभाषा गढ़ी | मेरे शरीर का तापमान हमेशा सामान्य लोगो से ज्यादा गर्म होता है , नतीजा निश्चल हर दूसरे दिन , तुम्हे बुखार है , नहीं मै ठीक हूँ , नहीं मुझे लग रहा है तुम्हे बुखार है  |  मै ना कहती वो मानते नहीं न जाने कितनी ही बार थर्मामीटर से चेक कर लिया गया सब सामान्य है लेकिन उन्हें विश्वास न हो पूरी तरह | सामान्य थर्मामीटर पर भरोसा न हुआ तो एक दिन डिजिटल थर्मामीटर उठा लाये | उसे देख हैरान होती बोली कोई और होता तो कहता वॉव मेरी बीबी कितनी हॉट है और कुछ ढंग के गिफ्ट लाता , एक तुम हो जो बार बार बुखार बोल कर उसकी हॉटनेस चेक करने के लिए थर्मामीटर लाए हो हद है , इस अरेंज मैरिज का कुछ नहीं हो सकता |  बस जो हॉटनेस किसी आधुनिक लड़की के लिए एक बड़ा कॉम्प्लिमेंट होता वो हमारे घर कॉमेडी बन गई तब से |
                                                        एक फिल्म में सांवली सी आधुनिक हीरोइन बोलती है सुंदरता कुछ नहीं होती , एटीट्यूट सब कुछ होता है | तो ये गांठ बांधी फ़िल्मी ज्ञान एक दिन काम आया | बर्फ में घूमने जाना था , सारी जिंदगी देखी यश चोपड़ा की फिल्मो का असर था कि एक रेड शिफॉन की साड़ी खरीद लाई |  उसे पहन बर्फ में फोटो खिचानी है एक दम कुछ तूफानी करना है सोच लिया | एक्साइटमेंट में घर आते ही फटा फट उस साड़ी को रेड प्लाजो के ऊपर ही  बांध लिया गया और रेड टॉप को पीछे कल्चर लगा ब्लॉउज बना लिया गया | खिड़की के सामने खड़े हो पल्लू पर्दे पर टांग लहराते पल्लू का सीन बनाया और पुरे एटीट्यूट के साथ पोज़ बना  यश चोपड़ा की सारी हीरोइनों की आत्मा को अपने अंदर आत्मसात  किया गया और निश्चल को फोटो खींचने के लिए बोला |  वो बिना मुझे पर ध्यान दिए , कंधे और कान के बीच अपना फोन फंसाये अपने फोन में बतियाते ,चार क्लिक कर दिए | मेरे हर पोज़ पर हम्म्म का जवाब देते |   जब फोटो देख कर कहा अच्छी दिख रही है ना तो बिना फोटो देखे जवाब फिर से था हम्म | बड़ा गुस्सा आया देखो तो मै इतनी एक्साइटेड हूँ और यहाँ से कोई रेस्पॉन्स ही नहीं , फिर उसी  फ़िल्मी ज्ञान का ध्यान आया | वॉव कितनी सेक्सी फोटो है ना और पुरुषीय चेतना जगाने वाले शब्द ने जादू दिखाया | कौन सी , एकदम ध्यान मेरे फोन पर |  वही जो तुमने खींची है , वाह कमाल फोटो ली है चलो फोटो खींचने आ ही गया | तारीफ पर कंधे उचकाते ,मै तो अच्छी फोटो लेता ही हूँ , नजर ध्यान से फोटो पर | मै ,झीनी सी साड़ी में फिगर अच्छा आता है ना , हूँ सही कह रही हो | फिर  खुद की फोटो की ऐसी नख से केश तक की खोज खोज कर तारीफ़ शुरू हुई की अगले कुछ देर तक जारी रही | कुछ ही देर में शब्दों और एटीट्यूट ने अपना काम कर दिया | एक साधारण सी फोटो जो बिना मन के  खींची गई , थकी हालत में आधे अधूरे तरीके से पहने साडी में , बाल तक बिखरे क्योकि कल्चर टॉप में लगाया है , वो फोट ख़ास बन किसी के मुंह से वॉव निकलवाने लायक बन गई और कुछ ही देर पहले मै उन्ही कपड़ो में उतनी ही साधारण और  ध्यान देने लायक नहीं थी जैसे सब्जी खरीदते समय बगल खड़ी महिला , बस हद ही थी |
                                                 
                   अगले दिन तो गजब ही हो गया जब वो फोटो उनके मोबाईल में दिख गई , मुझे दिखा मुस्कुराने लगे |  मन ही मन जोर की हँसी आई पर उसे रोका और बहार एक मुस्कान दे दी | पता न था कि वाकई में एटीट्यूट में जादू होता है | फिर भी चलो अच्छा है अब अपना बुढ़ापा अच्छा गुजरेगा , कभी जब तुम्हारे सर पर अंगुलिया फेरने के लिए बाल न होंगे और मेरे माथे का पसीना कही माथे के सिलवटों में फँसा रहा जायेगा तब ये आइडिया काम आयेगा |


#अधूरीसीकहानी_अधूरेसेकिस्से




           

         

                   





                                                 

May 08, 2018

कैसे गढ़ते थे ऐसे मजबूत नारी पात्र गुरुदेव - - - - - mangopeople



           कुछ साल पहले अनुराग और तानी बासु ने रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियों को टीवी पर दिखाया ( इतना अच्छा बनाया था की उसकी तारीफ में अलग से दो चार पोस्ट लिखी जा सकती है ) |  कुछ कड़िया सशक्त नारी पत्रों पर था | ऐसे ही  एक कहानी में जमींदार पति पत्नी है , तभी शहर में एक नाटक कंपनी आती है पति उसमे पैसे लगाते है और नाटक देखते देखते नाटक की नायिका से प्रेम करने लगते है | पत्नी को शक होता है वो पति की खोज खबर के  लिए चुपके से नाटक देखने  जाने लगती है , लेकिन जल्द ही वो पति पर नजर रखना छोड़ नाटक में खोने लगती है और खुद को नायिका की जगह रखने लगती है | इधर पति और नाटक की नायिका का प्रेम बढ़ता जाता है और अब वो ठीक से काम नहीं कर पाती , इसके लिए नाटक के निर्देशक से डांट भी खाती है और गुस्से में पति नायिका को अपने साथ अपनी दूसरी हवेली में ला कर रहने लगता है | जल्द ही वो अपनी पत्नी को भूल जाता है और वो  दोनों पति पत्नी के तरह रहने लगते है |  नायिका पत्नी सा ही व्यवहार करने लगती है , अकेले रहते रहते परेशान हो जाती है और अब वो नाटक में वापस काम करना चाहती है तो पति उसका असली पति बन काम करने से रोक देता है | पैसे ख़त्म होने लगते है और फिर पति को अपनी पत्नी की याद  आती है | अपने पुराने शहर पहुंचते है और देखते है कि  पत्नी उसी नाटक कंपनी की नायिका बन गई है और लोगो की खूब सराहना पा रही है | उसके बॉडीगार्ड पति को उससे मिलने तक नहीं देते |
                                  कुछ समय पहले तमिल साहित्य  महान काव्यग्रंथ शिलापदिकारम के बारे में पढ़ा , जो हजारो साल पहले लिखी गई थी | कहानी सेम पति और पतिव्रता पत्नी नाटक की नायिका और पति  का उससे प्रेम उसका साथ रहना पत्नी  को भूल जाना नायिका की माँ का लालची होना और पति द्वारा अपना सारा पैसा उस पर लुटा देना | एक गलतफहमी में पड़ वापस पत्नी के पास आना और पत्नी का उसे स्वीकार कर लेना | पैसे के लिए मदुरै जाना वहां उस पर रानी की पायल चुराने का आरोप लगना और हड़बड़ी में उसकी मौत | पत्नी का वहा कर अपने पति  निर्दोष साबित करना और उसके श्राप से पुरे मदुरै का जल कर भस्म हो जाना | लगा जैसे इसी कहानी का आधुनिक वर्जन गुरुदेव ने लिखा हो | अब ये कहने की जरुरत है कि  दोनों में से कौन वर्जन एक स्त्री के रूप में मुझे पसंद होगा | धारावाहिक के कितने की एपिसोड देख लगा उस जमाने में रविंद्रनाथ ने इतने मजबूत नारी चरित्र कैसे गढ़े होंगे | उनके जन्मदिन पर उनको मेरा प्रणाम |





     











                 












                                                                            

February 09, 2018

अपराधियों का विचारधाराकरण -------mangopeople





               
                                                   विचारधारा के इस कथित झगड़े में फायदा सरकार और विपक्ष के आलावा आजकल अपराधियों को भी हो रहा है | कोई नीजि दुश्मनी हो, खुन्नस हो ,चर्चा में आना हो , अपनी राजनीति चमकानी हो या कोई नीजि पूर्वाग्रह हो | अपराधी आराम से अपने अपराध को विचारधारा का चोला पहना अपराध कर लेता है और एक तबका खड़ा हो जाता है उसके बचाव में | कोई उसके कृत्य को सिर्फ अपराध मानता ही नहीं , सभी उसको एक वाद से जोड़ देते है और उसके तहत ही उसके अपराध पर चर्चा करते है | जो अपराध राज्य सरकारों के लिए कानून व्यवस्था का मसला बनना चाहिए था  वो विचारधारा के नाम पर हुए झगड़े बन ,  सरकारों को भी फायदा देते है | सरकार भी ऐसे आरोपों और चर्चा को बढ़ावा देती है ताकि वो जिम्मेदारी से बच सके |  कोई उससे ये न पूछे की राज्य की सुरक्षा व्यवस्था कानून की जिम्मेदारी उसकी है और ये चूक कैसे हुई | तब तो सरकारों के लिए और आसान हो जाता है जब किसी अपराध को विपक्ष की सोच से जोड़ दिया जाता है | फिर तो उसके लिए सुनहरा मौका होता है कि  वो उसे और जोरदार ढंग से प्रचारित करे जिसके किसी की भी उंगली उसके शासन की तरफ न उठे |  इसमें विपक्ष भी बराबरी का योगदान देता है , वो भी उसे अपराध न मान कानून व्यवस्था का मसला  नहीं उठाती | वह भी समयानुसार सिर्फ विचारधारा का नाम ही दे अपने लिए वोट का इंतजाम  करती है | विचारधारा उसकी सोच से मिलती हो तो अपराध का बचाव नहीं तो सरकार की सोच पर हल्ला |
                                       

                                                                                                   मामला अख़लाक़ का हो या अंकित का असल में तो इन्हे मात्र एक अपराध की नजर से देख राज्य सरकारों पर सवाल करना चाहिए कि राज्य में कानून का कितना राज है और अपराधियों पर कितना अंकुश | सवाल पुलिस विभाग से पूछा जाना चाहिए कि वो क्या कर रही है | ये मसले यदि अपराध की नजर से देखे जाते और सही सवाल समाज और विपक्ष की तरफ से उठाये जाते तो कोई भी तबका अपराधियों के साथ खड़ा न होता और न ही उसके बचाव में कुछ कह पाता | उसकी जाँच भी बिना किसी दबाव के सही तरीके से होती और सही अपराधी भी पकड़े जाते | ये विचारधारा का ही झगड़ा है कि कई बार अपराध कोई और कर जाता है और विचारधारा का नाम दे उसका रुख कही और मोड़ दिया जाता है जिससे जाँच करने वाली  एजेंसिया भी दबाव में आ कर या दबाव में गलत दिशा में अपराधियों को खोजने लगती है और असल हत्यारा आराम से बाहर घूम रहा होता है | एक आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या के मामले में ये दिख भी चुका है कि लोगो ने उनकी हत्या को इतना ज्यादा एक सोच से जोड़ दिया की पुलिस को उनके करीबी हत्यारो को भी पकड़ने में समय लग गया | ये आज की तथकथित विचारधारा ही है कि समाज एक अपराधी के साथ खड़ा हो जाता है या अपराध को लेकर अगर मगर करता है और इस स्थिति के लिए समाज के दोनों ही तबके बराबर के जिम्मेदार है |



                           

                                           

January 31, 2018

हे बीपी तू लेखक है तू साहित्यकार है ------- mangopeople











                           

                            वैसे तो गिरे हुए लोगो से  ज्यादा वास्ता तो रखना  नहीं चाहिए, ऐसे लोगो से दुरी ही भली , लेकिन जब गिरी हुई हरकत करके गिरने वाला आप का बीपी हो तो मजबूरन न चाहते हुए भी उस गिरे हुए को उठाने के लिए खुद ही प्रयत्न करना पड़ता है | पहले उठाने के लिए तकनीकी मदद ली गई लेकिन कहते है गिर को उठाना इतना आसान नहीं होता डीप शिप , आराम वाराम , दवा और दवा ( दारू अभी बाकि है )  सब नाकाम | फिर दिमाग में आया मर्ज जेहनी लगता है , खून में उबाल की जरुरत है |  इसके पहले की घर वाला बंदा गिरे हुए बीपी को मेरे उमर से जोड़ हमें बुढ़ापे का ताना मारे , उस पर ही खूब चिल पो कर खून का उबाल दिखा दिया गया |  लेकिन गिरी हुई बीपी को कोई जोश न आया वो वही निचे धरातल में पड़ी रही |  उसने भी सोचा होगा अरे छोडो ये तो रोज का है कुछ और प्रयत्न करो | तुरंत ही सोशल मिडिया का रुख कर देश दुनिया की चिंता कर सरकार को कोस नया प्रयत्न किया वो भी बेकार गया , वो अब भी भाव खाये वही पड़ी रही | २६ जनवरी के देशभक्ति गीतों का भी उस पर कोई असर न हुआ , महिला जाबांजो की वही "पहली बार"  परेड में आना जैसे नारी सशक्तिकरण वाले जुमले भी काम न आये |  फिर उसे ही लानते दी कि ऐसी गिरी हुई हरकते कर तू असल में मेरी नजरो में गिर रही है , ज्यादा गिरी तो मै भी परवाह न करुँगी , पड़ी रहना जहां पड़ी है | लेकिन वो ढीढ की तरह वही पड़ी रही , आखिर बीपी भी तो मेरी थी , मेरी ही जैसी , फालतू की बातो पर ध्यान ही न देना |
                                             
                                                 हिंदूवादीयो के वॉल के चक्कर लगाये अपने अंदर के हिन्दू को जगाने के लिए , वामपंथियों के भी लगाये ताकि देश संविधान धर्मनिरपेक्षता आदि  के संकट में होने पर खून में उबाल आये |   लेकिन पता चला गया , उसी दिन पता चल गया अंदर खून नहीं पानी बह रहा है कोई उबाल न आया | फिर अचानक एक लेखक साहित्यकार टाइप  पर नखरे गई  देखा नाराज थे/थी  की सम्मान हुआ लेकिन ठीक से न हुआ | तब क्या था बिना मेन्टोस के दिमाग की बत्ती जली | क्यों न बीपी तुझमे लेखक होने के भ्रम पैदा किया जाए  , तुझे ऊपर लाने के लिये थोड़ा ईगो मालिस की जरुरत है , थोड़ी झूठी प्रसंसा की चाहत है , तू खुद दो चार लाइनों की तारीफों में उफान मारती ऊपर आजायेगी और स्वयं को महान घोषित कर देगी | तो हे बीपी तू महान है  तू महानतम है , तू गिरी हुई नहीं है असल में तू  अच्छे लेखक की तरह गहराई से चिंतन मनन कर रही है | लेकिन अब और चिंतन मनन मत कर इससे ज्यादा चिंतन मनन किया तो तेरा लिखा इन दो कौड़ी के पाठको को समझ न आयेगा | वो तेरे महान लेखन को समझ नहीं पायेंगे और अपनी नासमझी छुपाने के लिए , बहुत सुन्दर प्रस्तुति , वाह खूब लिखा , गहरी बात , निशब्द हु जैसा लिख निकल लेंगे | इसलिए तुझे इतना गहरा चिंतन करने की आवश्यकता नहीं है | अब उठ जाग और ऊपर आ देख तेरे लेखन के बगैर कैसे हर जगह सन्नाटा पसरा है , कही कोई क्रांति न  हो रही , देश रसातल में जा रहा , साहित्य ख़त्म हो रहा | ऐसा न हो तू बस गहराई में चिंतन करती रहा जाये और कोई और कुछ भी लिख पुरस्कार ले जाये और तू बस आज कल के पुरस्कारों में पारदर्शिता नहीं पर भाषण देती रह जाये | तो उठ जाग ऊपर आ , ये देश, समाज साहित्य सब तेरे भरोसे ही रुके पड़े है , अब नखरे न दिखा थोड़ी अपनी गति बढ़ा  |




   


January 09, 2018

एक यात्रा वृतांत ऐसा भी -------mangopeople

                   
                                     

                                                     क्या आप को अपने शारीरिक दमखम को लेकर बड़ा गुमान है |  शरीर और मन से  अपने वास्तविक उम्र से अपने आप को कम समझ रहे है तो वास्तविकता की जाँच यानि रियलटी चेक के लिए तुरंत पहाड़ो की और रुख करे और वो भी सर्दियों के मौसम में | उसकी शुरुवात वहां पहुंचने के घुमावदार सड़को पर ही हो जाती है  फिर यदि आप ने किसी ऐसी जगह का चुनाव कर लिया जहा आप के होटल तक या मुख्य शहर में ही वाहन नहीं जाते जैसे शिमला तो फिर दिल की जवानी रवानी के साथ पैर घुटनो की असलियत एक पल में सामने गिरे पड़े होंगे | लेकिन ये सब आप आसानी से झेल लेंगे जब आप पहाड़ो की सुंदरता को अपने आँखों से निहारेंगे | जिधर भी नजर घुमायेंगे प्रकृति की हरियाली , बर्फ की सफेदी की सुंदरता ही पायेंगे | प्रदूषित हवा में साँस लेने के आदि लोगो को ऑक्सीजन की अधिकता और शुद्ध हवा से साँस लेने में समस्या भी आ सकती है | आसमान का असली चटक  नीला रंग आप को यही देखने को मिलेगा |
                                   
                                                         बर्फ देख कर खुद पर नियंत्रण रखने का प्रयास न करे , सारे पैसे आप ने बर्फ में खेलने के लिए ही खर्च किये है तो कूद पड़े , एक दूसरे पर बर्फ उड़ाये , या ऊपर की और चढ़ उस पर फिसले , लोग क्या कहेंगे की चिंता न करे क्योकि बाकी भी वही करे रहे होंगे | हम बड़े हो गए है जैसी बेफकूफी की बाते याद न रखे ,  ग्लोबल वार्मिंग को याद करे , क्या पता अगली बार आने पर बर्फ मिले न मिले , सो जितना बचपना कर सकते है जरूर करे  और आप के इस बचपने में आप का साथ देगा वहा का खाना |  इन सब धमा चौकड़ी के बाद भूख के मारे जब आप खाना खोजेंगे तो पहाड़ो पर एक ही खाना हर जगह उपलब्ध होगा और कभी कभी एक मात्र खाना वो है मैगी | ठंडे ठंडे मौसम में गरमा गर्म मैगी , आप कह उठेंगे मैगी का ये स्वाद पहले न आया ( ये जोरदार भूख की वजह से भी हो सकता है)  | पहले उपलब्ध खाना कभी न ठुकराये पहाड़ो पर भरोषा नहीं की आगे आप को कहा भोजन नसीब हो या आगे भी आप को यही उपलब्ध हो | वैसे खाने के बारे में ज्यादा सोचे नहीं गर्माहट के लिए बार बार पी  जा रही चाय , कॉफी , सूप पेट में जगह न छोड़ेंगे और पांच छह परत कपड़ो में जकड़े आप जी भर कुछ खा पायेंगे नहीं |
                                               
                                                    टॉय ट्रेन में बैठने का शौक है तो महँगी टिकट रिजर्वेशन वाला ले वो भी पहले से , वो बहुत सिमित संख्या में है , नहीं तो सस्ता टिकट आप को मुंबई की लोकल का याद दिला सकता है , सीट पहले आओ पहले पाव पर होता है ,साथ में बच्चे बुजुर्ग हो तो ये निराश करेगा | अकेले दुकेले है तो ऐतिहासिक यूनिवर्सिटी का रुख करे , बच्चे है तो ऐसी जगह जा कर उन्हें बोर न करे | जीवन में कभी रोप ट्रॉली पर बैठ चुके है तो जाखू मंदिर के लिए उसे न ले उससे बहुत कम में आप को टैक्सी वहा छोड़ देगी , बच्चो को दिखाना है तो एक तरफ का टिकट ले | वैसे आप पैदल जा कर ट्रैकिंग सा मजा ले सकते है | घोड़ो पर बैठ सैर करे , लेकिन वहा चल रहे किसी फ़ूड फेस्टिवल से कभी खाना न खाये |  सबसे जरुरी बात बर्फ में कोई ख़ास तरीके की फोटो शोटो खिचानी है तो जरा भी न शर्माये , स्टाइल मारे , मॉडलिंग करे , यशचोपड़ा की फिल्मो को याद कर झीनी  साड़ी में फोटो खिचवाये , क्योकि वो ग्लोबल वार्मिंग याद है न , बर्फ कल हो ना हो |


चेतावनी :- १- पहाड़ो पर यदि स्थानीय बाँदा कहे पास में ही है जगह बस पांच मिनट का ही रास्ता है उस पर कभी भरोषा न करे  | उनका पास आप के लिए बहुत बहुत बहुत दूर हो सकता है |
२- किसी भी भारतीय कोल्ड क्रीम पर भरोषा न करे , किसी में दम नहीं जो आप के नाजुक होठो , गालो या नाक को बचा सके |
३- ठंड में चेहरा सफ़ेद हो जाता है तो जोम्बी दिखने से बचने के लिए ब्लशर ले जाये और नाक और गाल बन्दर जैसे लाल हो  जाता है तो तब आप को समझ आता है जब वी मेट में करीना ने मेकअप नहीं किया था |
४- अपने गाड़ी के ड्राइवर पर  भरोषा रखे या पहाड़ी रास्तो में अपनी आँखे बंद रखे , रास्तो का सकरापन आप को हार्ट अटैक ला सकता है |
५- साथ बच्चे हो तो बर्फ के लिए उनके थाई तक के लिए बर्फ के बूट ले जाए , सामान्य बूट किसी काम का नहीं , बर्फ में पैर धसते बर्फ बूट के अंदर और फिर चीखता बच्चा |
५- सबसे जरुरी लिफाफे साथ रखे संभव है जो खाना मुंह से गया है वो वही से बाहर भी आ जाये |

                                     
     

                                           
                                     


                            

December 16, 2017

ये कैसी बतकहीया जो ख़त्म ही न होती -------- mangopeople


किसी शादी में दूल्हे दुल्हन हालत एक कठपुतली जैसे हो जाती है | जिनका अपना कोई दिमाग नहीं चलता रस्मो के नाम पर लोग जो कहते है दोनों करते जाते है | कितनी भी शादिया देख लो कुछ रस्मे ऐसी होती है जो खुद की शादी होने पर ही पता चलती है | न आप उनका कोई लॉजिक पूछते है और न कोई बताने वाला होता है बस होती है और करो और बेचारे दूल्हा दुल्हन पहले से ही इसके लिए तैयार होते है | इन रस्मो के बीच कुछ ऐसा मजेदार हो जाए जो जीवनभर याद रहे तो क्या कहना |  सुनती हूँ की शादी पहले दूल्हे दुल्हन को बात नहीं करनी चाहिए लेकिन हम दोनों तो एक दिन पहले तक फोन पर लगे थे | नतीजा शादी के दिन जयमाल के लिए जाने से पहले खूब तैयारी करनी पड़ी मुझे | एक तो मुझे ये याद रखना था कि मै दुल्हन हूँ और सब कुछ आराम से धीरे धीरे करना है | सगाई वाले दिन रस्मो के बाद जब सभी के पैर छूने की बारी आई तो ससुराल वालो के तो बड़े आराम से धीरे धीरे पैर छुए लेकिन जब अपने घर वालो की बारी है तो पुरे हाल में हिरणी की तरह कुलाचें मार मार सबको ढूंढ ढूंढ पैर छूना शुरू किया की सब हंस हंस के लोटपोट , खुद को बाद में वीडियो  में देख मुझे ही शर्म आई | तो इस बार याद रखना था कि कुछ भी ऐसा न हो पाये | दूसरी बात थी निश्चल से तीसरी  बार सीधा मिलने वाली थी , मुझे डर था कही हम एक दूसरे को देख हंसने लगे या बतियाना ना शुरू  कर दे स्टेज पर , ये बात शायद लोगो को पसंद न आये तो तय किया मुझे उनकी तरफ देखना ही नहीं है |
                                                         जयमाल  के लिए जाते समय एक बार भी उन्हें देखा नहीं फिर जयमाल डालते समय नजर मिली और कुछ रिएक्शन देने से पहले ही फोटोग्राफर की तरफ देखने लगी और दूसरी नजर जब वापस  उन पर डाली तो बिलकुल शॉक उनके हाथ में आरती की थाली थी | मन ही मन चीख पड़ी हे भगवान ये क्या रहा है |  इस बार दोनों की नजरे अच्छे से मिली लेकिन वो आश्चर्य में फैली हुई थी दूसरे ही सेकेण्ड नजर उनके  बगल में खड़ी बहन पर पड़ी वो हंस रही थी | तब तक हमें समझ आ चूका था कि इसके पीछे कौन है वो मुड़े और हँसते हुए पूछा इसका क्या करना है मेरी बहन ने उनके हाथ पकड़े और घुमाना शुरू करते हुए कहा जीजाजी आरती उतारिये दीदी की | हायो रब्बा ऐसी हंसी फूटी हम सब की कि क्या बताऊ | लेकिन मुझे याद था कि मै दुल्हन हु सो एक हाथ से अपना चेहरा छुपाया और ठहाके लगाना शुरू |  बोलो कहा मैंने सोचा था कि ३६ इंच की मुस्कान भी नहीं देना है और मै ठहाके लगा रही थी | दो बार हाथ घुमाने के बाद बहन ने थाली ले ली और हम दोनों की आरती उतारने की रस्म पूरी की | उसके हटते ही निश्चल शुरू तुम मेरी तरफ क्यों नहीं देख रही थी | पहले ये बताओ तुमने आरती की थाल कैसे पकड़ ली मैंने पूछा | मै पुरे टाइम तुम्हे देख रहा था कि तुम कब मुझे देखो और तुम हो सब जगह देख रही हो मुझे छोड़ कर | इसका आरती की थाली पकड़ने से क्या रिश्ता है कौन से दूल्हे को आरती उतारते देखा है तुमने , आज तुमने तो रोल रिवर्स कर दिया हम दोनों का |   मै तो तुम में बीजी था और पता नहीं कब तुम्हारी बहन ने थाली पकड़ा दी मुझे पता ही नहीं चला | लोग आते गये जाते रहे और हम आधे से ज्यादा टाइम एक दूसरे से बतियाने में व्यस्त थे |
                                   तब का दिन है और आज का दिन ये रोल रिवर्स आज भी चला आ रहा है और हमारी बतकहीया भी , बस फर्क है तो इतना की अब एक ही  बोलता है और एक सुनता है |


           



     


                 


           
             




                   
 

December 10, 2017

अधूरी सी कहानी अधूरे से किस्से -----mangopeople




   शायद हमारी शादी का तीसरा दिन था , अपने ससुराल से दूसरे दिन ही हम दोनों वापस आ गये थे , मेरे घर की रस्मे निभाने के लिए | निश्चल को ऊपर के कमरे में रुकने के लिए भेज दिया गया था | अगले दिन सुबह सुबह मुझे नास्ता ले कर भेजा गया उनके पास | जैसे ही उन्हें देखा मुंह से निकला " वॉव अच्छे दिख रहे हो " उन्होंने भी मुझे देख कर कहा तुम भी अच्छी दिख रही हो | मैंने कहा अरे नहीं मै कहने के लिए नहीं कह रही सच में तुम अच्छे दिख रहे हो , वो मुस्करा दिए |   रेड टी शर्ट और जींस पहन रखी थी लग रहा था जैसे किसी ने उनकी एज अचानक से पांच दस साल कम कर दी हो | मन ही मन सोचने लगी केवल कपड़ो से इतना फर्क आ गया अभी तक उन्हें फॉर्मल कपड़ो में ही देख रही थी शायद इसलिए |  या कही ऐसा तो नहीं मैंने अभी तक उन्हें ठीक देखा ही नहीं है | हमारी अरेंज मैरिज , वो मुंबई , मै  बनारस , पांच महिने बतियाये तो खूब फोन पर  लेकिन देखा नहीं , फिर दो दिन से सिर्फ शादी की रस्मे , शायद ध्यान से एक दूसरे को देखा ही नहीं है अभी तक हम दोनों ने  | मै ये सोच  रही थी और वो कुछ ढूंढ रहे थे , पूछा क्या ढूंढ रहे हो तो बोले चश्मे का एक शीशा नहीं मिल रहा | तब लगा अच्छा ये बात है,  चश्मा नहीं लगाया इसलिए इतना फर्क लग रहा है | शीशा मिला नहीं लगा शायद कामवाली से गिर के टूट गया होगा सुबह सफाई के लिए आई थी और उसने फेंक दिया | खैर हम दोनों निचे आये  सभी को पता चल गई कि दामाद जी बिन चश्मे के है |
                                                  उसके बाद पूरा खानदान पूजा के लिए हम दोनों को लेकर गंगा जी गया , वहा ढेर सारी सीढिया और हमारे घरवालों को टांग खिचाई की आदत , लो सब शुरू हो गये | कभी छोटे चचेरे भाई आते "आराम से चलो जल्दी नहीं है"  और जवाब में मै कहती फुट लो यहाँ से वरना अभी बताती हूँ , तो कभी दादा आता , "ध्यान  हाथ पकड़ लो एक एक सीढ़ी उतरो" और मै गुस्से में बोली जाओ जाओ अपनी बीबी को देखो दुल्हन सी इतनी सजी है कही वो ना गिर पड़े | निश्चल कन्फ्यूज एक तरफ खुश है की उनकी अतिरिक्त पूछ हो रही है मेरा इतना भी इतना ख्याल रखा जा रहा है और मै सबको उलटे जवाब दे रही हूँ | मुझे एक बार टोक भी दिया अरे ऐसे क्यों बोल रही हो और मै सोच रही हूँ निश्चल ये देखभाल नहीं हो रही तुमने चश्मा नहीं लगाया है सब टांग खिच रहे है कि तुम्हे ठीक दिख रहा है की नहीं | हमारे बनारस वापस आने पर जब उन्होंने मेरे पुरे खानदान को कार के पास आ कर हमारे स्वागत में देखा तभी से गदगद थे | मुझे कहने लगे तुम्हे कितना मानते है सब , मै चुप रह गई ये जानते भी की ये मेरे घरवालों का सामान्य व्यवहार है घर के बेटी के लिए मै कोई ख़ास नहीं हूँ , पर इससे निश्चल के नजर में अपनी इज्जत बढ़ रही थी , तो हमने भी सोचा ऐसा ही मानो | बनारस घाट वाली देखभाल से वो और खुशफहमी में |
                                                     खैर मेरे घर की रश्मे ख़त्म हो गई और ससुराल पहुंची |  वहा हमारी शादी की फोटो आ गई थी सब फोटो की ही बात कर रहे थे |  हमने भी थोड़ी बाते सुनी और सीधे अपने कमरे में आ कर निश्चल से पूछा तुम चश्मा कब से लगा रहे हो , बोले बस तुम्हे मिलने अगस्त में आया था ना तभी से | कितना नंबर है दूर का है या करीब का वो पूछने लगे क्यों पूछ रही हो , मैंने कहा घर में सब हमारी शादी की फोटो देख कर, गुस्सा कर रहे है तुम पर, कि तुमने चश्मा क्यों पहना हुआ है पूरी एलबम ख़राब कर दी है | जवाब में बोले नहीं ज्यादा नंबर नहीं है , पहले कभी देखा नहीं सबने इसलिए | असल में मै जब तुमसे मिलने आने वाला था उसी समय मेरे दोस्त ने नया शॉप ओपन किया था तो मैंने भी अपनी आँखे चेक करवा ली तो एक आंख में थोड़ा नंबर आया तो मैंने नई शॉप से कुछ  तो लेना है सोच चश्मा ले लिया , सब बोले अच्छा लग रहा है तो लगा कर यहाँ आ गया | मतलब तुम्हे नंबर नहीं है तो फिर तुमने शादी में चश्मा क्यों लगाया था तब तो निकालना था ना | अरे तुम्हारे लिए याद है हमारी इंगेजमेंट के बाद  मैंने तुम्हे फोन पर पूछा था कि तुम्हे चश्मा कैसा लग रहा है तो तुमने कहा कि तुम्हे अच्छा लग रहा है , तुम्हे अच्छा लगा रहा था तो क्यों निकालता | मै उनकी बात सुन पूरी तरह शॉक थी , मैंने कहा तुम मजाक कर रहे हो निश्चल तुम्हे नंबर है , बोले नहीं है तुम चेक कर लो मैंने तुम्हारे कहने पर लगा रखा था | मैंने हैरानी में कहा  तुम्हे पता है मैंने तो बस इसलिए कहा था कि मुझे लगा तुम चश्मा लगाते हो मुझे वो ख़राब तो नहीं लग रहा तुम बस ये जानना चाह रहे हो क्योकि लड़कियों को चश्मे वाले लडके पसंद नहीं होते | बस इसलिए मैंने कह दिया कि मुझे चश्मे से कोई परेशानी नहीं है पसंद है | पर इसका मतलब ये थोड़े था की जो नहीं पहनता वो भी पहन ले | कसम से बड़ा कन्फ्यूजन हो रहा है समझ नहीं आ रहा है की हंसू की गुस्सा करू | तुम्हारी इस बात पर प्यार से आई लव यू बोलू या मेरी इकलौती शादी की एलबम ख़राब करने के लिए तुम्हे आई हेट यू कहु | बोले इकलौती शादी से तुम्हारा क्या मतलब है हमने कहा जो तुमने किया है उस हिसाब से तो मुझे पहली शादी बोलनी चाहिए थी |   वो दिन और आज का दिन   स्टील कन्फ्यूज बंदे के साथ लव किया जाये या हेट किया जाये |


#अधूरीसीकहानी_अधूरेसेकिस्से













November 25, 2017

ट्रेजिडी क्वीन नहीं खुशमिजाज औरते ---------mangopeople


             


                                                          एक है श्रीमान सुरेश त्रिवेणी उन्होंने एक फिल्म बनाई है "तुम्हारी सुलु " चोर राम ( लिखना तो चोट्टा चाहती थी पर वो गाली टाइप  हो जाती ना  ) ने कहानी चुरा कर एक फिल्म बना दी और न ही जिनकी कहानी चुराई है उन्हें कोई रॉयल्टी दी और न ही क्रेडिट दिया है | कहानी भी किसी एक से नहीं कई अलग अलग जगह से चुराई है और किसी का भी नाम देने तक की जरुरत नहीं समझी है | उन्होंने मुंबई जैसे बड़े शहरों में रह रही मुझे जैसी ;)  खुशमिजाज और अपनी मर्जी  और अपने तरीके से जीवन जी रही महिलाओ के जीवन से छोटी छोटी सच्ची कहानियां चुराई है और फिल्म बना दी लेकिन एक पैसे का क्रेडिट  न दिया है , बड़ी ज्यादती है | फिल्म देखते कई बार वो इतनी अपनी लगती है कि मुंह से निकल जाता है अरे कम्बख्त ने मेरा किस्सा चुरा कर फिल्म बना दी है , अरे ये  वाला किस्सा तो मेरी दोस्त का है ,मतलब की बस  हद ही  है | कोई ट्रेजडी क्वीन नहीं , कोई बड़े बड़े सपने नहीं , कुछ कर गुजरेंगे का कोई तूफानी जज़्बा नहीं , सिंपल स्वीट सी लाइफ और सिंपल सी इच्छाए | खुशमिजाज औरत , खुराफाती औरत , कुछ भी कर सकने का आत्मविश्वास वाली औरत  , छोटी छोटी खुशियों का बड़ा सेलिब्रेशन करने वाली औरत | सबसे ज्यादा शुक्र है कि  पति बड़ा रियल सा और सामान्य सा है , शुक्र है कि उन्होंने पति को पत्नी के जीवन का "विलेन" नहीं बनाया है शुक्र है कि उन्होंने पति की भूमिका के साथ कोई अत्याचार नहीं किया है  | इस फिल्म को सिर्फ किसी स्त्री की कहानी मत सोचिये ,उन्होने बड़े शहरों में रह रहे पति पत्नी के बदलते रिश्तो को दिखाया है , दिखाया है बड़े शहरों में परिवारों में गृहणी की भूमिका , सोच  उसके  प्रति पति के नजरिये में बहुत बदलाव आया है और  पत्नी का भी पति के प्रति वो ,आप , सुनो जी , तम्हे जैसा ठीक लगे वाला , मेरी दुनियां तेरे बिना कुछ नहीं टाईप से बहुत बदल गया है | फिल्म में तो लव मैरिज है किन्तु असल जीवन में बहुत सारे अरेंज मैरिज भी अब एक तरफे प्रेम  और समर्पण पर नहीं टिके है |
                                                         
                                                              पति विलेन नहीं है लेकिन पत्नी के अचानक काम करने से उसके इतर खुशियो से  थोड़ी जलन में जो प्रतिक्रिया है वो बड़ी वास्तविक सी है | एक सीन में मन किया जोरदार ताली बजाउ ,पति अपनी पत्नी को काम करने से रोकने के लिए कहता है उसे बेटी चाहिए और उसने उसका नाम तक सोच लिया है उनका पहले से ही १० -१२ साल का बच्चा है |  बिलकुल यही मेरी पड़ोसन के साथ हुआ था  वो ग्रहणी थी मुझे जॉब करता देख उनकी भी इच्छा हुई और जैसे ही ये पति को बोला पति के अंदर दूसरे बच्चे की इच्छा जाग गई थी और तीन महीने बाद प्रेग्नेंट होने की खुशखबरी भी  |  बड़ा ही कॉमन सा फंडा है महिलाओ को काम पर जाने से रोकने का उन्हें बच्चो में फंसा कर रखो | वैसे फिल्म में उसे पत्नी के काम करने से नहीं  आरजे वाले काम से परेशानी है और उसका भी एक कारण है , वो आप फिल्म देखेंगे तभी समझेंगे | पति के ये कहने पर विद्या हँस कर पति को चिढ़ाती है मजाक उड़ाती है कि इस उमर में बेटी के दादा जी लगोगे | ( मेरे पतिदेव ऐसा कहते तो मेरी प्रतिक्रिया भी यही होती ) लेकिन वो विद्या पर कोई दबाव नहीं डालता अपनी तरफ से बस एक ट्राई मारता है और ऐसी बातो को सुलझे रिश्ते ऐसे ही हलके में उड़ा देते है |  विद्या का एक  मायके का परिवार भी है जो   उनके १२ वि फेल  होने पर पर बार बार ताने भी देता है और उनके लिए फ़िक्र भी करता है | परिवार  उन्हें पहले काम करने के लिए फिर काम छोड़ने के लिए कहता है  | एक बार उनकी बहन कहती है काम छोड़ दे वरना बाद में पछ्तायेगी फिर रोते हुए हमारे पास आयेगी , विद्या  गुस्से  में  पलट कर बोलती है हां आउंगी बिलकुल आउंगी  तुमलोग परिवार हो मेरे |  हाय राम ये भी मेरा डायलॉग है , जब किसीने एक बार कहा कि भाई  के विवाह के बाद बहनो को  अपने घर से दुरी बना लेनी  चाहिए , मैंने यही कहा फिर परिवार के होने का मतलब क्या है , यदि उसमे एक दूसरे का ख्याल न रखा जाये | एक बेटा है उनका अंत में दिखाता है कि कैसे बच्चे   घर में हो रही सारी बातो को समझते है और हम उन्हें बस बच्चा ही समझते रह जाते है |  फिल्म का अंत जिस पॉजिटिव नोट पर होता है वो बड़ा कमाल है , नहीं नहीं आखरी सीन नहीं वो तो फ़िल्मी है , जब लगता है कि एक स्टोरी एक सैड एंड पर ख़त्म होगी तभी उसकी खुशमिजाजी  वापस आना बड़ा सही और वास्तविक लगता है |

                                                                        जब मुंह से निकले क्या एक्टिंग की है कमाल है तो वो बड़ी बात नहीं है , बड़ी बात तो वो है जब ये बोला जाये , क्या ये एक्टिंग कर रही थी | विद्या और उनके पति की भूमिका निभा रहे मानव कौल दोनों ने इतनी सहज एक्टिंग की है कि आप को ये नहीं लगता कि किसी एक्टिंग को देख रहे है |  जरा भी लाऊड नहीं इसके लिए डॉयरेक्टर भी तारीफ के काबिल है उन्हें अच्छे से पता था कि  सुलु  को किस रूप में पर्दे पर दिखाना है और विद्या का बेस्ट चुनाव उन्होंने किया मानव कौल का भी | एक रिव्यू फिल्म देखने बाद पढ़ी "फिल्म के कुछ सीन आप को गुदगुदाएंगे"  कम्बख्त उस सीन में मै बगल वाली खाली सीट पर गिर गिर कर हँसे जा रही थी , पहली बार हँसने के कारण मेरे इतने आँसू गिरने लगे की शर्ट की बाहे गीली हो  गई , क्यकि पर्स से टिशू या रुमाल निकालने के चक्कर में मै सीन मिस नहीं करना चाहती थी , क्योकि उसमे से एक खुराफात तो मै भी करती हूँ और  पहली बार फिल्म देखते  पतिदेव को मिस किया ये फिल्म दिखाने उन्हें क्यों नहीं लाई  | यदि आप खुराफाती , कुछ नया करते रहने वाले नहीं है या छोटे शहरों से है तो आप को ये फिल्म समझ नहीं आयेगी | एक सीन में तो नेहा धूपिया भी आश्चर्य से पूछती है क्या तुम अपने हसबैंड  से ऐसे बाते करती हो , तो फिल्म तो किसी किसी  लिए है |

 नोट :- वैसे त्रिवेणी जी आप को बता दू खुराफाती होने के लिए १२ वि में दंडी मार या या बैकबेंचर होने की जरुरत नहीं है , वो फर्स्ट बेंचर भी हो सकते है |

  #tumharisulu         

November 06, 2017

अच्छी कहानियों के बुरे पहलू --------- mangopeople




                                                                      बिटिया का तीसरे जन्मदिन का दूसरा दिन था वो उपहार में मिले सभी खिलौनों से एक साथ खेलना चाहती थी और मेरा नियम बना था हर महीने एक खिलौना निकलेगा | क्योकि बच्चे के लिए एक खिलौने की आयु अधिकतम २०-२५ दिन होता है उसके बाद उससे बोर हो कर भूल जाता है और नये की मांग करता है एक साथ सब दिया तो २५ दिनों में सब से बोर | उन्हें बहलाने के लिए उन्हें काम में उलझने के इरादे से उन्हें कहा सभी खिलौने बेडरूम में लाओ बारी बारी , उसे करने के बाद जाओ अब स्टूल लाओ , चलो अब मै स्टूल पर चढ़ती हूँ एक एक खिलौना मुझे दो ऊपर रख दू , एक जो पसंद है उसे रहने दो | दो तीन खिलौने देने के बाद उन्होंने मुझसे कहा , क्या तुम मेरी स्टेप मम्मी हो | कानो में पिघला शीशा डाल देना , दिल में जहर बुझा खंजर घोप देना जैसी बाते सुन रखी थी महसूस उस दिन पहली बार किया था | इसे अतिश्योक्ति न समझे मुझे लगा जैसे मुझे चक्कर आ रहे है और मैंने टेक न लिया तो स्टूल से गिर पड़ूँगी | निचे उतरी और बेटी को गले लगाते फिर से पूछा क्या कहा बेटा और उसने बात दोहरा दी | जैसा की हर माँ का ख्याल होता है मेरा बच्चा दुनिया का सबसे मासूम बच्चा है और लोगो से ये देखा नहीं जाता और वो उसे गलत बाते सिखा कर उसे बिगाड़ते है और माँ से उसके रिश्ते ख़राब करते है वही मैंने भी सोचा  | तुम्हे ये किसने सिखाया की मै तुम्हारी स्टेप मम्मी हो | तो तुम मुझसे इतना काम क्यों करवा रही हो सिंड्रेला और स्नोवाइट की स्टेप मॉम की तरह  |

                                                                  इन बच्चो के लिए बनी प्यारी प्यारी राजकुमारियों के कहानियों से भी हम बच्चो को कुछ गलत सीखा सकते है उनमे कोई पूर्वाग्रह भर सकते है ऐसा तो सपने में भी नहीं सोचा था | ऐसे ही जाने अनजाने हम सभी अपने दिलो दिमाग की सारी बुराइयाँ सारे गलत विचार , पूर्वाग्रह अपने अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए दे देते है | जब कहानियां सुनाते है तो बुरे पात्रों को और बुरा बताते समय उसे अपनी भावभंगिमाओं से और डरावना बुरा बनाते है मन में भरा पूरा जहर उगल देते है |  खुद हम कितना ग्रसित है इन ऊलजलूल विचारो से , जीवन में कभी किसी सौतेली माँ  से नहीं मिली हूँ , सौतेले मामा है लेकिन उनसे रिश्ते सामान्य है , फिर भी खुद के लिए सौतेला सुनना , जहर बुझा लग रहा था | मुझे याद है उसके बाद जब मैंने उन्हें कृष्ण की कहानी सुनाई तो एक बार भी कंस के साथ मामा शब्द नहीं लगाया , क्या पता मामा के लिए कुछ गलत भर दूं  | याद रखिये बच्चो में भरा गया एक गलत विचार , किसी के लिए नफरत , किसी के लिए कोई पूर्वाग्रह एक दिन पलट कर किसी न किसी रूप में आप के ही सामने जरूर आयेगा | खुद को सुधारे न सुधारे विरासत में बच्चो को कुछ ख़राब न दे कम से कम |

#माँबापगिरी